"धूप से दोस्ताना"
दरमियां इक ज़माना रक्खा जाए,
तब कोई पल सुहाना रक्खा जाए।
सर पे सूरज सवार रहता है,
पीठ पर शामियाना रक्खा जाए।
तो यह अब तय हुआ कि अपने साथ,
कोई अपने सिवा न रक्खा जाए।
खूब बातें रहेंगी रास्ते भर,
धूप से दोस्ताना रक्खा जाए।
हों निगाहें ज़मीन पर लेकिन,
आसमां पर निशाना रक्खा जाए।
ज़ख़्म पर ज़ख़्म का गुमां न रहे,
ज़ख़्म इतना पुराना रक्खा जाए।
दिल लुटाने में एहतियात रहे,
यह ख़ज़ाना खुला न रक्खा जाए।
नील पड़ते रहें जबीनों पर,
पत्थरों को ख़फ़ा न रक्खा जाए।
यार! अब उसकी बेवफ़ाई का नाम,
कुछ शायराना रक्खा जाए।
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